ओपनएआई ने पेटागन से किया समझौता, कर्मचारियों ने शुरू की बगावत

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वाशिंगटन। अमेरिका में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। अब एआई केवल टेक्नोलॉजी का विषय नहीं रह गया, बल्कि यह जियोपॉलिटिक्स और सैन्य रणनीति का भी अहम हिस्सा बनता जा रहा है। हाल ही में अमेरिकी रक्षा विभाग पेटागन ने अपनी सुरक्षा और रक्षा प्रणालियों में एआई टूल्स के इस्तेमाल की योजना बनाई है। लेकिन इसी को लेकर टेक कंपनियों और उनके कर्मचारियों के बीच तीखी बहस शुरू हो गई है।

विवाद तब बढ़ा जब अमेरिकी सरकार ने एआई कंपनियों से कहा कि उनके मॉडल्स का उपयोग सैन्य और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े कार्यों में हो सकता है। एआई कंपनी एन्थ्रोपिक, जो एआई मॉडल बनाती है, ने इस प्रस्ताव पर आपत्ति जाहिर की है। कंपनी का कहना था कि उसका एआई“मास सर्विलांस” या पूरी तरह स्वचालित हथियारों (ऑटोनोमस वेपन्स) के लिए इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। इस कारण पेटागन और एन्थ्रोपिक के बीच मतभेद बढ़ गए।
वहीं एन्थ्रोपिक के पीछे हटने के बाद एआई कंपनी ओपन एआई ने पेटागन के साथ समझौता कर लिया। इस डील के तहत ओपनएआई के एआई मॉडल्स को सरकारी और रक्षा से जुड़े सिस्टम में इस्तेमाल किया जा सकता है। हालांकि ओपन एआई के सीईओ सैम आल्टनमैन ने कहा कि इस समझौते में कई सुरक्षा शर्तें जोड़ी गई हैं। उनके अनुसार एआई का इस्तेमाल घरेलू निगरानी (डोमेस्टिक सर्विलांस) या पूरी तरह ऑटोनोमस हथियार बनाने के लिए नहीं किया जाएगा। इसके बावजूद इस फैसले ने टेक इंडस्ट्री के भीतर बहस को और तेज कर दिया। कई कर्मचारियों को डर है कि अगर एआई का सैन्य उपयोग बढ़ता है, तब भविष्य में इसका दुरुपयोग हो सकता है। रिपोर्ट्स के अनुसार गूगल और ओपन एआई के सैकड़ों कर्मचारियों ने एक खुला पत्र लिखकर एआई के सर्विलांस और ऑटोनोमस हथियारों में इस्तेमाल का विरोध किया। इस विवाद के बाद कुछ लोगों ने विरोध के तौर पर चैटजीपीटी को अपने मोबाइल से हटाना भी शुरू कर दिया। वहीं कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि अगर एआई का जिम्मेदारी से उपयोग किया जाए, तब यह राष्ट्रीय सुरक्षा, खुफिया विश्लेषण और युद्ध रणनीति में काफी मददगार साबित हो सकता है। दरअसल, अमेरिकी रक्षा कार्यक्रम प्रोजेक्ट मेवन पहले से ही एआई का उपयोग सैटेलाइट और ड्रोन डेटा के विश्लेषण के लिए कर रहा है, जिससे संभावित लक्ष्यों की पहचान करने में सहायता मिलती है। यही कारण है कि एआई का सैन्य उपयोग अब वैश्विक बहस का विषय बन चुका है।

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