सुनने में अजीब लग सकता है पर दुनिया के सबसे बड़े रेगिस्तानी देशों में गिने जाने वाले सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात को रेत आयात करनी पड़ रही है. सवाल उठता है कि जब इन देशों के पास रेत की कोई कमी नहीं, तो आखिर बाहर से रेत लाने की जरूरत क्यों पड़ रही है?
दरअसल, सऊदी अरब के भविष्य के शहर, UAE की आसमान छूती इमारतें और अरबों डॉलर के मेगा प्रोजेक्ट्स जिस रेत की मांग करते हैं, वह आम नजर आने वाली रेगिस्तानी रेत से बिल्कुल अलग है. यही फर्क इन देशों को ऑस्ट्रेलिया जैसे दूर-दराज़ के देशों की ओर देखने पर मजबूर कर रहा है. आइए इसे विस्तार से समझते हैं |
रेगिस्तान की रेत क्यों फेल हो जाती है?
रेगिस्तानी रेत के कण इतने चिकने होते हैं कि वे सीमेंट के साथ ठीक से चिपक नहीं पाते. नतीजा यह होता है कि कंक्रीट कमजोर बनती है और भारी इमारतों का वजन सहन नहीं कर पाती. इसलिए ऊंची इमारतों, पुलों, मेट्रो और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में खास किस्म की रेत का इस्तेमाल जरूरी होता है |
ऑस्ट्रेलिया बना रेत का बड़ा सप्लायर
ऑस्ट्रेलिया आज दुनिया के बड़े निर्माण-ग्रेड रेत निर्यातकों में शामिल है. साल 2023 में ऑस्ट्रेलिया ने करीब 273 मिलियन डॉलर की रेत का निर्यात किया. 2023 में सऊदी अरब ने ऑस्ट्रेलिया से करीब 1.4 लाख डॉलर की प्राकृतिक निर्माण योग्य रेत खरीदी. यह सिलसिला 2024 में भी जारी रहा, खासकर तब जब सऊदी अरब ने अपने बड़े प्रोजेक्ट्स को तेज रफ्तार दी
सऊदी अरब का विजन 2030, निओम सिटी, द लाइन, रेड सी प्रोजेक्ट और किद्दिया जैसे प्रोजेक्ट्स भारी मात्रा में उच्च गुणवत्ता वाले कंक्रीट की मांग करते हैं. इन प्रोजेक्ट्स में किसी तरह की गुणवत्ता से समझौता संभव नहीं है। ऐसे में विदेशी रेत आयात करना मजबूरी बन गया है |
बुर्ज खलीफा की कहानी भी यही है
दुनिया की सबसे ऊंची इमारत बुर्ज खलीफा के निर्माण में भी स्थानीय रेगिस्तानी रेत का इस्तेमाल नहीं किया गया. इस इमारत को बनाने के लिए करोड़ों लीटर कंक्रीट, हजारों टन स्टील और विशेष निर्माण सामग्री लगी, जिसमें ऑस्ट्रेलिया से मंगाई गई रेत का अहम योगदान रहा |
UAE और कतर भी इसी राह पर
सिर्फ सऊदी अरब ही नहीं, UAE और कतर भी इसी समस्या से जूझ रहे हैं. दुबई और अबू धाबी की तेजी से बदलती स्काईलाइन, आर्टिफिशियल आइलैंड्स और बीच प्रोजेक्ट्स के लिए भारी मात्रा में समुद्री और विदेशी रेत का इस्तेमाल किया गया है. पाम जुमैरा जैसे प्रोजेक्ट्स ने स्थानीय रेत संसाधनों पर भारी दबाव डाला |
दुनिया के सामने खड़ी रेत की कमी
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के मुताबिक, हर साल दुनिया में करीब 50 अरब टन रेत की खपत हो रही है. यह दुनिया में सबसे ज्यादा निकाली जाने वाली ठोस प्राकृतिक सामग्री बन चुकी है. अनियंत्रित रेत खनन से नदियों का कटाव, जैव विविधता का नुकसान और पर्यावरण संकट गहराता जा रहा है. इस बढ़ते संकट को देखते हुए कई देश मैन्युफैक्चर्ड सैंड और निर्माण कचरे के दोबारा इस्तेमाल जैसे विकल्पों पर काम कर रहे हैं. सऊदी अरब भी ऐसे समाधानों की तलाश में है, ताकि भविष्य में विदेशी रेत पर निर्भरता कम की जा सके |
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