ट्रंप ने दिया झटका, भारत के इंटरनेशनल सोलर एलायंस से बाहर हुआ अमेरिका

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नई दिल्ली। भारत के इंटरनेशनल सोलर एलायंस को बड़ा झटका लगा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस संगठन से अमेरिका के बाहर होने का फैसला किया है। ट्रंप प्रशासन का यह कदम न केवल वैश्विक जलवायु लक्ष्यों के लिए चुनौती है, बल्कि भारत और अमेरिका के बीच पिछले तीन दशकों से बने मजबूत रिश्तों में भी दरार पैदा करने वाला है।
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक ट्रंप ने एक बड़ा कार्यकारी आदेश जारी करते हुए भारत द्वारा प्रवर्तित इंटरनेशनल सोलर एलायंस से हटने की घोषणा की है। यह फैसला ट्रंप की उस व्यापक नीति का हिस्सा है, जिसके तहत अमेरिका उन अंतरराष्ट्रीय संगठनों से नाता तोड़ रहा है जिन्हें वह अपने राष्ट्रीय हितों और संप्रभुता के खिलाफ मानता है। सूत्रों का मानना है कि भारत का कहना है कि अमेरिका को जहां जाना है जाए, यह गठबंधन कायम रहेगा। उसके हटने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा।
बता दें इस संगठन की शुरुआत 2015 में पेरिस जलवायु शिखर सम्मेलन के दौरान पीएम मोदी और फ्रांस के तत्कालीन राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने की थी। इसका मुख्य मुख्यालय भारत के गुरुग्राम में है। इसका लक्ष्य 2030 तक सौर ऊर्जा में 1 ट्रिलियन डॉलर का निवेश जुटाना है। साथ ही विकासशील देशों को सस्ती सौर तकनीक और फाइनेंस उपलब्ध कराना ताकि वे प्रदूषण बढ़ाए बिना अपनी ऊर्जा जरूरतें पूरी कर सकें। 
अमेरिका के पूर्व जलवायु दूत जॉन केरी ने ट्रंप प्रशासन के इस कदम को खुद को पहुंचाया गया घाव बताया है। उन्होंने कहा कि यह फैसला कोई आश्चर्य की बात नहीं है, लेकिन यह चीन के लिए एक गिफ्ट की तरह है। इससे उन देशों और प्रदूषण फैलाने वाली ताकतों को छूट मिल जाएगी जो अपनी जिम्मेदारी से बचना चाहते हैं। अमेरिका 31 यूएन संस्थाओं और 35 गैर-यूएन अंतर-सरकारी संगठनों से हट गया है, जिसमें यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज, इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज, इंटरनेशनल ट्रेड सेंटर और ग्लोबल काउंटरटेररिज्म फोरम शामिल हैं। वाइट हाउस की एक फैक्ट शीट के मुताबिक ये संगठन, कन्वेंशन और संधियां अमेरिकी राष्ट्रीय हितों, सुरक्षा, आर्थिक समृद्धि या संप्रभुता के विपरीत काम करते हैं।
विशेषज्ञों के मुताबिक अमेरिका का बाहर होना न केवल जलवायु के लिए बुरा है, बल्कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए भी नुकसानदेह है। अमेरिका उन ट्रिलियन डॉलर के निवेश और रोजगार के अवसरों को खो देगा जो क्लीन एनर्जी सेक्टर में आने वाले हैं। सौर तकनीक के वैश्विक नियमों को लिखने में अब अमेरिका की कोई भूमिका नहीं रहेगी, जिससे अन्य देशों खासकर चीन का दबदबा बढ़ेगा। भारत के लिए यह एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती है क्योंकि आईएसए पीएम मोदी का एक ड्रीम प्रोजेक्ट है। अब भारत को फ्रांस और अन्य सदस्य देशों के साथ मिलकर फंडिंग और तकनीक के नए रास्ते तलाशने होंगे।

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